कहानी  :  पुत्र-प्रेम

लेखक  :  प्रेमचंद

कहानी समीक्षा


पुत्र-प्रेम एक पिता की हृदयहीनता और संवेदनहीनता का अत्यंत मार्मिक चित्रांकन करता है। भारतीय समाज में परिवार का विशेष महत्त्व है। परिवार के सभी सदस्य एक-दूसरे के सुख-दुख में शामिल रहते हैं और कठिन-से-कठिन परिस्थितियों में भी मज़बूती के साथ एक-दूसरे का साथ देते हैं लेकिन जिस परिवार में सदस्य एक-दूसरे से भावानात्मक रूप से नहीं जुड़े होते हैं उस परिवार का भविष्य सदैव अंधकारमय होता है।

हिन्दी कथा-साहित्य में प्रेमचंद का दृष्टिकोण यथार्थवादी रहा है। उन्होंने अपने साहित्य के माध्यम से राष्ट्रीय-आंदोलन, किसान-मज़दूर की समस्या, स्त्री-संघर्ष, दलित-विमर्श, सामंतवादी-साम्राज्यवादी-पूँजीवादी व्यवस्था, हिन्दुस्तानी भाषा आदि विषयों पर वैचारिक बहस की शुरुआत की। प्रेमचंद स्वाधीन भारत में नए समाज व्यवस्था के पक्षकार थे जिसका विकल्प उन्हें समाजवादी व्यवस्था में दिखता था। प्रेमचंद ने कई बार बोल्शेविक क्रांति का उल्लेख भी किया है। प्रेमचंद व्यक्तिगत संपत्ति के प्रखर आलोचक हैं। प्रेमचंद ने लिखा है –“किसी देश पर राज्य किया जाता है तो इसलिए कि महाजनों, पूँजीपतियों को ज़्यादा से ज़्यादा नफा हो। इस दृष्टि से मानो आज दुनिया में महाजनों का ही राज्य है। मनुष्य समाज दो भागों में बँट गया है। बड़ा हिस्सा तो मरने और खपनेवालों का है और बहुत ही छोटा हिस्सा उनलोगों का, जो अपनी शक्ति और प्रभाव से बड़े समुदाय को अपने वश में किए हुए है।”

(मंगलसूत्र व अन्य रचनाएँ)
आधुनिक कथा-साहित्य पूँजीवादी सभ्यता की देन है। पूँजीवाद मुख्यत: उस आर्थिक व्यवस्था को कहते हैं जिसमें उत्पादन के साधनों पर व्यक्तिगत मालिकाना होता है। जब अर्थ-व्यवस्था, उत्पादन और लाभ पर किसी एक व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह का अधिकार होता है तब उस व्यवस्था पूँजीवादी व्यवस्था कहा जाता है।
पूँजीवादी व्यवस्था ने मनुष्य के स्वतंत्र चिंतन को सदैव चोट पहुँचाई है और व्यक्ति का चिंतन स्वतंत्र न रहकर अर्थ पर आश्रित हो जाता है। उत्पादन के साधनों पर वैयक्तिक अधिकार ने व्यक्ति को व्यक्तिवादी बना दिया है जिसमें समष्टि के लिए कोई स्पेस नहीं है। प्रेमचंद की प्रसिद्‌ध कहानी ‘पुत्र-प्रेम’ बाबू चैतन्यदास की पूँजीवादी दृष्टिकोण पर आधारित है जिसमें बाबू चैतन्यदास का मानना है कि यदि जिस खर्च से स्वयं या दूसरों का लाभ न हो उस खर्च को विष के समान व्यर्थ मानना चाहिए। कथावस्तु पारिवारिक वातावरण लिए हुए है। बाबू चैतन्यदास के दो पुत्र हैं, बड़े का नाम प्रभुदास और छोटे का नाम शिवदास। दोनों भाई कॉलेज में पढ़ते हैं; दोनों चतुर हैं; दोनों होनहार हैं। पिता चैतन्यदास अपने बड़े पुत्र प्रभुदास से अत्यंत प्रेम करते हैं और उसे इंग्लैंड भेजकर बैरिस्टर बनाना चाहते हैं। यानी चैतन्यदास के द्‌वारा अपने पुत्र प्रभुदास पर धन-खर्च का उद्‌देश्य उनका व्यक्तिगत स्वप्न था जिसमें वे अपने पुत्र को बैरिस्टर बनते देखना चाहते थे। यहाँ व्यक्तिगत स्वप्न की बात इसलिए की जा रही है क्योंकि जब प्रभुदास को जानलेवा तपेदिक की बीमारी हो जाती है और उसके इलाज के लिए डॉक्टर उसे इटली के सेनेटोरियम में भेजने की बात करते हैं तब तीन हज़ार के खर्च की बात सुनकर बाबू चैतन्यदास हिचकिचाते हैं। उनके लिए तीन हज़ार का खर्च व्यर्थ जान पड़ता है क्योंकि डॉक्टार ने स्पष्ट कर दिया था कि सेनेटोरियम में भेजने के उपरांत भी बीमारी से पूरी तरह स्वस्थ होने की कोई गारंटी नहीं है। पूँजीवादी व्यवस्था में व्यक्ति सिर्फ़ अपने लाभ के बारे में सोचता है और बाबू चैतन्यदास उसी व्यवस्था को मानने वाले वकील हैं जो जमींदार भी हैं और बैंक में कुछ रुपए भी हैं। पत्नी तपेश्वरी के दबाव डालने और रोने-धोने के बावजूद भी चैतन्यदास अपने पूर्वजों की संचित जायदाद और जमा रुपयों को अनिश्चित हित की आशा पर बलिदान नहीं करते हैं। यह पूँजीवादी व्यवस्था का सबसे क्रूरतम चेहरा है जिसमें मानव और मानवता के लिए कोई स्थान सुरक्षित नहीं है। बाबू चैतन्यदास कहते हैं – “आधा नहीं, उसे मैं अपना सर्वस्व दे देता, जब उससे कुछ आशा होती, वह खानदान की मर्यादा और ऐश्वर्य बढ़ाता और इस लगाए हुए धन के फलस्वरूप कुछ कर दिखाता। मैं केवल भावुकता के फेर में पड़कर धन का ह्रास नहीं कर सकता।”
चैतन्यदास अपने छोटे पुत्र शिवदास को पढ़ने के लिए इंग्लैंड भेज देते हैं और प्रभुदास परलोक सिधार जाता है।
कहानी के अंतिम हिस्से में पिता चैतन्यदास का हृदय-परिवर्तन होता है और वे पश्चाताप की अग्नि में जलने लगते हैं। जब पुत्र के दाह-संस्कार के लिए मणिकर्णिका घाट पहुँचते हैं तब वहाँ उनकी मुलाकत एक ऐसे नवयुवक से होती है जो अपने मृत पिता के अंतिम संस्कार के लिए ढोल बजाते, गाते, पुष्प आदि की वर्षा करते हुए जन-समूह के साथ चला आ रहा है। युवक के शब्दों में – “भैया, रुपया-पैसा हाथ का मैल है। कहाँ आता है, कहाँ जाता है, मनुष्य नहीं मिलता। जिंदगानी है तो कमा खाऊँगा। पर मन में यह लालसा तो नहीं रह गयी कि हाय! यह नहीं किया, उस वैद्‌ध के पास नहीं गया, नहीं तो शायद बच जाते। हम तो कहते हैं कि कोई हमारा सारा घर-द्‌वार लिखा ले, केवल दादा को एक बोल बुला दे। इसी माया-मोह का नाम जिंदगानी है, नहीं तो इसमें क्या रखा है? धन से प्यारी जान, जान से प्यारा ईमान। बाबू साहब, आपसे सच कहता हूँ, अगर दादा के लिए अपने बस की कोई बात उठा रखता तो आज रोते न बनता। अपना ही चित्त अपने को धिक्कारता। नहीं तो मुझे इस घड़ी ऐसा जान पड़ता है कि मेरा उद्‌धार एक भारी ऋण से हो गया। उनकी आत्मा सुख और शांति से रहेगी तो मेरा सब तरह कल्याण ही होगा।”
प्रेमचंद के रचना-संसार में कोई भी किरदार पूर्णत: नकारात्मक नहीं है। उनका मानना है कि व्यक्ति के आचरण पर वातावरण का व्यापक प्रभाव पड़ता है। परिस्थितियों के अनुरूप व्यक्ति का व्यवहार अपेक्षित है, इसलिए प्रेमचंद ने अपने कथा-साहित्य में हृदय-परिवर्तन की संभावना को बनाए रखा है। प्रेमचंद ने अपनी रचनाओं के माध्यम से आदर्शोन्मुखी यथार्थ की बात कही है जो किसी भी आदर्श समाज-व्यवस्था के लिए अनिवार्य है।

 

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"स्मृतियों की रेखाएँ" में संकलित "भक्तिन" महादेवी वर्मा का प्रसिद्‌ध संस्मरणात्मक रेखाचित्र है। इसमें महादेवी वर्मा ने अपनी सेविका भक्तिन के अतीत और वर्तमान का परिचय देते हुए उसके व्यक्तित्व का रोचक किन्तु मर्मस्पर्शी शब्द चित्रण किया है। महादेवी वर्मा हिन्दी साहित्य के छायावादी काल की प्रमुख कवयित्री है। उन्हें आधुनिक युग का मीरा भी कहा जाता है। महादेवी वर्मा ने संस्कृत से एम०ए० किया और तत्पश्चात प्रयाग-महिला विद्‌यापीठ की प्रधानाचार्या नियुक्त की गईं। महादेवी वर्मा ने स्वतंत्रता के पहले का भारत भी देखा और उसके बाद का भी। वे उन कवियों में से एक हैं जिन्होंने व्यापक समाज में काम करते हुए भारत के भीतर विद्यमान हाहाकार, रुदन को देखा, परखा और करुण होकर अन्धकार को दूर करने वाली दृष्टि देने की कोशिश की। उन्होंने न केवल साहित्य लिखा बल्कि पीड़ित बच्चों और महिलाओं की सेवा भी की।

महादेवी वर्मा की भाषा संस्कृतनिष्ठ सहज तथा चित्रात्मक है जिसमें हिन्दी के तद्‌भव व देशज शब्दों का भी प्रयोग किया गया है। इनकी कुछ प्रसिद्‌ध रचनाओं के नाम हैं - गिल्लू, सोना, अतीत के चलचित्र, स्मृति की रेखाएँ, हिमालय आदि।

भक्तिन का वास्तविक नाम लछमिन था। उसके चरित्र में अनेक गुण और कुछ अवगुण भी थे। बचपन में अपनी माँ का साया छूट जाने के कारण उसका जीवन संघर्षपूर्ण रहा। सौतेली माँ ने उसके साथ हमेशा बुरा व्यवहार किया। भक्तिन का पाँच वर्ष की आयु में विवाह और नौ वर्ष की छोटी आयु में ससुराल गौना हो गया जहाँ उसे पति का भरपूर प्यार तो मिला लेकिन उसके जीवन का संघर्ष उसके व्यक्तित्व का हिस्सा बनता गया। वह तीन कन्याओं की माँ बनी। सास और जेठानियों की उपेक्षा का शिकार बनी। पति उसे बहुत प्यार करता थी। लेखिका के शब्दों में -

"वह बड़े बाप की बड़ी बात वाली बेटी को पहचानता था। इसके अतिरिक्त परिश्रमी, तेजस्विनी और पति के प्रति रोम-रोम से सच्ची पत्नी को वह चाहता भी बहुत रहा होगा, क्योंकि उसके प्रेम के बल पर ही पत्नी ने अलगौझा करके सबको अँगूठा दिखा दिया।"

बड़ी बेटी का विवाह होने के बाद छत्तीस वर्ष की आयु में भक्तिन को बेसहारा छोड़कर उसका पति इस संसार से विदा हो गया। भक्तिन ने अपने केश मुंडवा कर, कंठीमाला धारण कर तथा गुरुमंत्र लेकर अपने जेठ-जेठानियों की आशाओं पर पानी फेरते हुए दोनों छोटी लड़कियों का विवाह कर अपने बड़े दामाद तथा बेटी को घर जमाई बना लिया। लेकिन बड़ी लड़की विधवा हो गई। जेठ ने विधवा लड़की की शादी साजिश के तहत अपने तीतरबाज़ साले से करवा दिया। परिवार में क्लेश होने लगा और घर की समृद्‌धि चली गई। जमींदार का लगान न चुकाने के कारण एक दिन ज़मींदार ने भक्तिन को दिन भर कड़ी धूप में खड़ा रखा। वह यह अपमान सह नहीं सकी और कमाने शहर, लेखिका के घर आ गई और उसकी सेविका बन गई।

भक्तिन के चरित्र की निम्नलिखित विशेषताओं ने उसे लेखिका के लिए विशेष बना दिया-

भक्तिन बहुत कर्मठ और मेहनती महिला थी। छोटी बहू होने के कारण घर-गृहस्थी के सारे कार्य का बोझ उठाती थी। वह खेती-बाड़ी की देखभाल भी करती थी।

भक्तिन का जीवन संघर्षों का दूसरा नाम था। माँ की मृत्यु के उपरांत सौतेली माँ के कटु व्यवहार से लेकर ससुराल वालों की उपेक्षा तक, पति की मृत्यु के बाद अकेले ही पारिवारिक-विवाद का सामना करना तथा गाँव से शहर आकर लेखिका के यहा~म नौकरी करने तक भक्तिन ने सदैव विषम परिस्थितियों का सामना किया।

भक्तिन बहुत स्वाभिमानी थी। जब एक दिन ज़मींदार ने लगान न चुकाने के कारण दिनभर कड़ी धूप में खड़ा रखा तब भक्तिन यह अपमान न सह सकी और अकेले ही शहर की ओर कमाने निकल पड़ी।

भक्तिन अपने पति से अत्यंत प्रेम करती थी। उसके जीवित रहते भक्तिन ने कंधे से कंधा मिलाकर घर-गृहस्थी का सारा कार्य किया। पति से कभी शिकायत तक नहीं की। पति की मृत्यु के उपरांत उसने दूसरा विवाह नहीं किया।

भक्तिन समर्पित सेविका भी थी। लेखिका ने उसे सेवक-धर्म में हनुमान जी से स्पद्‌र्धा करने वाली बताया है। वह लेखिका का पूरा ध्यान रखती थी। खाना बनाना, बत्रन, कपड़े, सफाई आदि तो करती ही थी साथ ही लेखिका के बाद सोती और उनसे पहले उठ जाती। वह कभी तुलसी की चाय, दही की लस्सी आदि बनाकर देती थी। लेखिका के काम जैसे चित्र उठाकर रखना, रंग की प्याली धोना, दवात देना, काग़ज़ संभाल देना आदि कार्य कर देती थी। बदरी-केदार के दुर्गम मार्ग में वह लेखिका के आगे तथा धूल भरे रास्ते में वह पीछे रहती ताकि लेखिका को किसी तरह का कष्ट न हो। वह जेल के नाम से डरती थी पर सेवा धर्म के लिए लेखिका के साथ जेल जाने के लिए वायसराय ( लाट) से भी लड़ने के लिए तैयार थी।

भक्तिन के मन में दया का भाव भी भरा हुआ था। जब कोई विद्‌यार्थी जेल जाता तो उसे बहुत दुख होता था। वह छात्रावास की लड़कियों के लिए चाय-नाश्ता भी बना देती थी। उसके मन में बच्चों के प्रति वात्सल्य का भाव भी भरा हुआ था।

भक्तिन दृढ़ व्यक्तित्व की स्त्री थी। वह दूसरों को अपने अनुरूप ढाल लेती थी। वह कुतर्क करने में माहिर थी। पढ़ने में उसका मन नहीं लगता था। वह छुआछूत मानने वाली स्त्री थी। रसोईघर में किसी का भी प्रवेश उसे पसंद नहीं था।

भक्तिन घर में बिखरे हुए पैसों को उठाकर  बिना लेखिका को बताए भंडार-घर में मटकी में रख देती थी। यह चोरी ही है लेकिन भक्तिन यह तर्क देती कि अपने घर का रुपया-पैसा सँभाल कर रख देना चोरी नहीं होता है।

निष्कर्ष में हम कह सकते हैं कि भक्तिन एक सांसारिक महिला थी जिसमें अपने विलक्षण व्यक्तित्व से लेखिका का मन मोह लिया था। अत: वह लेखिका को अभिभावक की तरह लगने लगी थी।

कहानी : भक्तिन

    लेखिका    : महादेवी वर्मा

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